Saturday, October 1, 2022

71 के युद्ध ने हमारा बाल्टिस्तान छीन लिया और रातों-रात हुए इस बंटवारे ने कितने परिवारों की तकदीरें बदल दींः जुलेखा बानो

नूब्रा वैली, लेह के बोगडांग गांव में रहने वाली जुलेखा बानो बाल्टिस्तान की पहली महिला वकील हैं। भले ही उनका वाला बाल्टिस्तान भारत में पड़ता है, पर सामाजिक बहिष्कार और कट्टरपंथ यहां भी कम नहीं है। हालांकि पहली महिला बलती वकील बनने के बाद जुलेखा अपने इलाके की लड़कियों के लिए रोल मॉडल की तरह हैं। अर्चना शर्मा ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

आपके इलाके में लड़कियों की पढ़ाई को लेकर क्या सोच है?
कुछ साल पहले तक हमारे गांव बोगडांग में लड़कियों की पढ़ाई को लेकर सोच बहुत ही रिवायती थी। लड़कियां गांव के स्कूल में ज्यादा से ज्यादा आठवीं तक पढ़ लेतीं, फिर उनकी शादी हो जाती। आगे पढ़ने का तो सवाल ही नहीं उठता था। भारतीय सेना ने गुडविल आर्मी स्कूल की शुरुआत की, जहां मेरे पिताजी ने मेरी बहन, भाई और मुझे पढ़ने भेजा। आर्मी के प्रोत्साहन पर ही गांव में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ, जिसमें मैंने डांस किया और मेरी बहन ने गाना गाया। इस कार्यक्रम से हमारे गांव वालों की कट्टरपंथी इस्लामी सोच को झटका लगा और उन्होंने हमारा सामाजिक बहिष्कार कर दिया। लड़कियों का पढ़ना या किसी सांस्कृतिक गतिविधि में शामिल होना सहज स्वीकार्य नहीं था।

लॉ ही पढ़ना है, यह विचार कैसे मन में आया?
गांव में सामाजिक बहिष्कार होने के बाद हमारा परिवार देहरादून शिफ्ट हो गया। यों भी गांव में आगे की पढ़ाई मुमकिन नहीं थी, इसलिए कहीं तो निकलना ही था। बारहवीं के बाद आगे क्या पढ़ाई करनी है, मैं इसको लेकर उधेड़बुन में रही। इंजीनियरिंग, मेडिकल की तरफ मेरा रुझान नहीं था। कुशल वक्ता और आत्मविश्वास से भरपूर होने के कारण लॉ एक आसान और सही चुनाव लगा। वैसे, मुझे बिलकुल विश्वास नहीं था कि मैं पहली महिला बलती वकील बनूंगी।

भाषा की वजह से आपको या आपके इलाके के और लोगों को पढ़ाई में दिक्कत महसूस होती है?
हमारे इलाके में बलती भाषा बोली जाती है और गांव के स्कूल में उसी माध्यम से पढ़ाई होती है। चूंकि मेरी हिंदी और अंग्रेजी काफी कमजोर थी, इसलिए देहरादून में मेरा एडमिशन छठी की जगह चौथी क्लास में हुआ। सभी विद्यार्थी इस परेशानी का सामना करते हैं। मैं आर्मी स्कूल की आभारी हूं जहां हमें हिंदी और अंग्रेजी की शिक्षा मिली। इससे मुझे आगे मदद मिली। यह जरूरी है कि सभी स्कूलों में हिंदी और अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई हो।

एक महिला वकील होने की वजह से आपको अपने यहां किस तरह की मुश्किलें पेश आईं?
अब तो परिस्थिति में काफी बदलाव आ गया है। गांव में लड़कियों की पढ़ाई को सामान्य तरीके से लिया जा रहा है। डिसकिट, जहां की मुंसिफ कोर्ट में मैं प्रैक्टिस करती हूं वहां लोग मुझ पर बहुत भरोसा करते हैं कि ये अपने गांव की लड़की है तो सही तरीके से मदद करेगी।

यानी लोग अब उतने कट्टरपंथी नहीं रहे?
अब लोगों की सोच काफी बदल चुकी है। हमारे गांव की लड़कियां बारहवीं के बाद भी पढ़ाई कर रही हैं। कई लड़कियां गांव के बाहर जाकर नर्सिंग, टीचिंग, पुलिस फोर्स में भर्ती हो रही हैं। पहले ऐसा असंभव था।

बदलाव का रास्ता आसान नहीं। क्या कभी आपको अपने प्रयासों की नाकामी पर हताशा भी होती है?
मेरा जीवन कभी आसान नहीं रहा है, पर संघर्ष आपको और निखारता है। अभी हमारे गांव का नंबरदार एक अनपढ़ व्यक्ति है। ऐसा व्यक्ति हमारे गांव के लिए सही नहीं है- यह मैंने लोगों को समझाने की काफी कोशिश की। इसी वजह से बड़े शहर की जगह मैं लेह में रहकर ही काम करना चाहती हूं।

आप एक ऐसे इलाके में हैं जहां विस्थापन की लकीर ने रातों-रात लोगों की तकदीरें बदल दीं। यहां मौसम की बेरहमी भी है। अब हालात कैसे हैं?
अपने पिता और गांव के और लोगों से ऐसा मैंने सुना है कि 1971 की लड़ाई के बाद बाल्टिस्तान का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में चला गया और भारत के हिस्से में सिर्फ पांच बलती गांव रह गए। रातों-रात हुए इस बंटवारे ने कितने परिवारों की तकदीरें बदल दीं। परिवार के कुछ लोग जो पाकिस्तानी हिस्से में किसी काम से गए थे, वे वहीं रह गए और आधे लोग भारतीय हिस्से में रह गए। आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो पाकिस्तानी हिस्से में गए अपने परिवार के सदस्यों का शोक करते हैं। सरहद पार जाना मुश्किल है, पर लोग फोन, इंटरनेट के जरिए जुड़े हुए हैं।

आपकी पढ़ाई और नजरिए को पुख्ता करने में सबसे ज्यादा योगदान किसका रहा है?
हमारा पूरा परिवार पढ़ाई को लेकर काफी संजीदा रहा है, खासकर मेरे पिता। उन्होंने हमेशा हम सभी भाई-बहनों की पढ़ाई पर जोर दिया। सभी बोलते कि बेटियों को क्या पढ़ाना है, बेटे को पढ़ाने में फायदा है। पर उन्होंने किसी की नहीं सुनी और इस मकसद के लिए समाज से कड़ी टक्कर भी ली। पहले मेरी मां को भी लगता था कि लड़कियों की जल्दी शादी हो जानी चाहिए। पर देहरादून आने पर सभी लड़कियों को पढ़ता देख उनकी सोच भी बदली और हमें पढ़ाने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की। देहरादून में कमाई का कोई जरिया तो था नहीं, तो मेरे माता पिता ने एक हॉस्टल खोला जहां चालीस बच्चे रहते थे। हॉस्टल का सारा काम हमारा पूरा परिवार मिल कर करता था।

भविष्य को लेकर आपकी क्या कुछ खास योजनाएं हैं, खासकर अपने प्रदेश की महिलाओं के लिए?
मैं हर रोज किसी न किसी परिवार से मिलकर लड़कियों की पढ़ाई, खेल-कूद के बारे में प्रोत्साहित करती हूं। अपने यहां की लड़कियों को ऊंचे पदों पर अलग-अलग क्षेत्रों में देखना मेरा सपना है। बाल्टिस्तान में खुबानी के फूल उगने पर चिलीमिंदो फेस्टिवल मनाया जाता है जो हमारे गांव में नहीं होता। मैं चाहती हूं कि यह हमारे गांव में भी हो।

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