Wednesday, September 28, 2022

आनंदपाल गैंग का पवन बानूड़ा गिरफ्तार,  जानिए कैसे एक सरकारी कर्मचारी अपराध के दलदल में फंसा

इस कहानी की शुरुआत करीब 8 साल पहले होती है। 14 साल का बच्चा था सुभाष। दसवीं की पढ़ाई कर रहा था। बॉक्सिंग में स्टेट चैंपियनशिप खेल चुका था। स्किल्स में और निखार लाने के लिए हिसार में बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहा था।

इसी तरह सुभाष का बड़ा भाई पवन इलाहाबाद बैंक में नौकरी कर रहा था। छह महीने ही हुए थे नौकरी लगे। एक महीने पहले शादी हुई थी। जिंदगी में सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन फिर आया 23 जुलाई 2014 का वो खौफनाक दिन।

बीकानेर जेल में गोलियां चलीं और दोनों भाइयों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। दोनों भाइयों के नाम के आगे लगे बॉक्सर और बैंकर शब्द हट गए। एक कालिख उनके नाम के साथ जुड़ गई…और दोनों भाई बन गए गैंगस्टर। अपराध के दलदल में ऐसे फंसे कि घर छूटा, सरकारी नौकरी चली गई। भूखा तक रहना पड़ रहा है।

अच्छी खासी जिंदगी बिखर गई। महीनों तक घरवालों की शक्ल नहीं देख सके। कई रातें भूखे पेट करवटें बदलते हुए गुजारनी पड़ीं। गैंगस्टर्स के पाताललोक की तीसरी सीरीज में आज बात गैंगस्टर बलबीर बानूड़ा और उसके परिवार की, जिनकी कहानी सबक देती है…अपराध की ये दुनिया सिर्फ एक इंसान को नहीं, कई पीढ़ियों को बर्बाद कर देती है।

पत्नी बोली- कुछ नहीं बचा, बस जी रहे हैं
23 जुलाई 2014 को राजस्थान के दो खूंखार गैंगस्टर आनंदपाल और बलबीर बानूड़ा पर बीकानेर जेल में अटैक हुआ था। बलबीर की गोली लगने से मौत हो गई थी। बलबीर की मौत ने एक झटके में उसके परिवार के पैरों तले की जमीन खींच ली।

क्या 8 साल बाद भी बानूड़ा के परिवार की जिंदगी कुछ पटरी पर लौट पाई? इसी सवाल का जवाब जानने भास्कर टीम जयपुर से 135 किलोमीटर दूर सीकर में बानूड़ा गांव पहुंची। बानूड़ा गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक ढाणी में 4 मकान बने हुए थे।

किसी ने एक मकान की तरफ इशारा कर बताया- ये है बलबीर बानूड़ा का मकान। हमने दरवाजा खटखटाया। काफी देर बाद एक महिला ने गेट खोला। पता चला कि वो बलबीर की पत्नी है। पीछे-पीछे बलबीर की मां भी आ गई। दोनों ने अंदर आने के लिए कहा।

बोलीं- किसी काम से बच्चे जयपुर गए हैं। घर पर हम सास-बहू ही हैं। जिंदगी के बारे में पूछा तो बोलीं- ‘कुछ नहीं बचा। बस जी रहे हैं।’ इसके आगे उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। चुपचाप अंदर मकान में चली गई। दो मोबाइल नंबर जरूर दिए। एक नंबर उनके बेटे और दूसरा भाई का था, जो एडवोकेट हैं।

मोबाइल पर बात करने के थाेड़ी देर बाद एडवोकेट आए। उनसे बलबीर के बारे में पूछा तो बोले- ‘परिवार ने काफी दर्द झेला है, जख्मों को कुरेदने से कोई फायदा नहीं है’। अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसके बाद भास्कर टीम वापस लौट आई।

बैंकर जो गैंगस्टर बन गया
अब बारी थी कहानी के 2 सबसे अहम किरदारों बानूड़ा के बेटे सुभाष और भतीजे पवन से मिलने की। सुभाष अभी फरार है। भास्कर टीम ने पवन से मिलने की कोशिश की। 3 दिन में 50 से ज्यादा लोगों से बात की, लेकिन कोई पवन से मिलाने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद किसी तरह उससे वॉट्सएप पर संपर्क हो गया और वो मिलने के लिए तैयार हो गया।

उसके साथी हमें एक सुनसान मकान में लेकर गए, जहां पवन हमारा इंतजार कर रहा था। बात छेड़ी तो बोला कि कोई गम नहीं है। पुलिस ने अपराधी तो बना दिया, अब क्या है। बदला लेंगे। पवन ने बताया बीकानेर जेल में फायरिंग की घटना से छह महीने पहले मेरी इलाहाबाद बैंक में नौकरी लग चुकी थी। एक महीने पहले ही शादी हुई थी। काका को जेल में मार दिया, तभी तय कर लिया था बदला लूंगा।

बॉक्सर से गैंगस्टर तक का सफर
पवन ने बताया काका की हत्या हुई तब सुभाष 14 साल का था और 10वीं में पढ़ रहा था। हिसार में बॉक्सिंग की तैयारी कर रहा था। स्टेट चैंपियनशिप खेल चुका था। पवन का कहना है कि पुलिस ने उस पर कई झूठे मुकदमे लगा दिए। तीन महीने पहले भी लड़ाई-झगड़े में मुकदमा लगा दिया। उसकी जांच चल रही है। कहीं कुछ भी होता है तो नाम लगा देते हैं। वह खुद भी जल्द ही सरेंडर करने वाला है।

3 महीने से घर नहीं गया, कई रातें भूखा सोया
पवन ने बताया- जेल से छूटे 20 महीने हो गए हैं। मनोज ओला पर फायरिंग की थी। जेल से आने के बाद 3 से 4 बार ही घर गया हूं। रात को जाता हूं और कुछ देर में आ जाता हूं। पिता प्रिंसिपल हैं। परिवार पूरी तरह से सम्पन्न है। खुद का भी काम ठीक चल रहा है। बोला कि मेरी दो बेटियां हैं। एक बड़ा भाई है। सुभाष का भाई विकास दुबई रहता है। मां-बाप काफी समझाते हैं, लेकिन अब क्या करें।

फरारी के दौरान पुलिस ने परिवार से लेकर दोस्तों को भी परेशान किया। जेब में कई बार पैसे नहीं थे, कई रातें भूखा सोया। हमने किसी को कभी बेवजह परेशान नहीं किया, किसी से फिरौती नहीं मांगी।

कभी दोस्त थे बलबीर बानूड़ा व राजू ठेहट
बता दें कि 1997 में बलबीर बानूड़ा और राजू ठेहट दोनों दोस्त हुआ करते थे। दोनों शराब के ठेके लेते थे। शराब ठेके से ही दोनों में दुश्मनी हो गई। ठेके पर सेल्समैन विजयपाल की राजू ठेहट से कहासुनी हो गई। विजयपाल रिश्ते में बलबीर का साला लगता था। राजू ठेहट ने साथियों के साथ विजयपाल की हत्या कर दी। यहीं से दोनों ने अलग गैंग बना ली। बलबीर की गैंग में आनंदपाल शामिल हो गया।

ठेहट के करीबी गोपाल फोगावट को मारा
इसके बाद आनंदपाल ने राजू ठेहट के करीबी गोपाल फोगावट की हत्या कर दी। दोनों गैंग में कट्‌टर दुश्मनी हो गई। शेखावाटी में 2016 तक 15 से ज्यादा हत्या हो चुकी थीं। 26 जनवरी 2014 राजू ठेहट पर सीकर जेल में गोली चली, लेकिन वह बच गया। फिर इस घटना के 6 महीने बाद ही बीकानेर जेल में बलबीर बानूड़ा व आनंदपाल पर हमला हुआ। इसमें बलबीर की मौत हो गई। फिर आनंदपाल ने ईंट-पत्थरों से राजू ठेहट गैंग के दो लोगों की हत्या कर दी। आनंदपाल भी पेशी पर ले जाते हुए फरार हो गया। इस तरह आनंदपाल राजस्थान का सबसे बड़ा गैंगस्टर बन गया। पुलिस ने 24 जून 2017 को मौलासर में उसका एनकाउंटर कर दिया।

यह भी पढ़े

25 अप्रैल से राजस्थान में पेयजल सप्लाई हो सकती है बंद, ये है बड़ी वजह

आपकी राय

क्या मायावती का यूपी चुनावों में हार के लिए मुस्लिम वोटों को जिम्मेदार ठहराना सही है?

View Results

Loading ... Loading ...

Get in Touch

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related Articles

Latest Posts