Monday, September 26, 2022

Bihar Drone Startup Success Story : बिहारी युवा देवेश झा के ड्रोन ने देश-दुनिया में बनाई पहचान , 10 लाख से शुरुआत, अब 40 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट

12वीं पास देवेश झा मधुबनी जिले के खजौली ब्लाक के कन्हौली गांव के रहने वाले हैं। 2017 में इन्होंने फसलों की समुचित देखरेख, बीमारियों का पता लगाने और कीटनाशक का छिड़काव करने के लिए ड्रोन बनाया। ड्रोन से फसलों की फोटोग्राफी कर आनलाइन मार्केटिंग की भी सुविधा किसानों को दी। इस नई सोच को देखते हुए 2017 में ही बिहार सरकार और वर्ष 2018 में भारत सरकार ने स्टार्टअप के रूप में इनका चयन किया। इसके बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली से पांच लाख रुपये का ग्रांट मिला। अलावा, एंजल इन्वेस्टर ने 3.5 करोड़ रुपये की अलग से फंडिंग की।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हुए मुरीद

देवेश झा कहते हैं- 22 फरवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी ड्राेन की कार्यशैली को देखा और शराबबंदी में भी इसके उपयोग को लेकर निर्णय लिया गया। बिहार कृषि विश्वविद्यालय तो पहले से ही इस ड्रोन का उपयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि बिहार सरकार के अलावा हरियाणा सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार भी मेरे ड्रोन प्रोजेक्ट का लाभ ले रही है। अब हौलैंड और सूरीनाम से भी ड्रोन प्रोजेक्ट की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि ड्रोन के साथ एक साफ्टवेयर को जोड़ा गया है। इससे बीमारियों की सेंसर के जरिए सटीक जानकारी मिल रही है।


जरूरी नहीं है कि जिस काम को आप करना चाहते हों उसके लिए आपके पास डिग्री होनी ही चाहिए। बिहार के मधुबनी के रहने वाले देवेश झा ने 12वीं तक की पढ़ाई की है। लेकिन, अपने स्किल की बदौलत नए तरीके का ड्रोन बनाकर उन्होंने सभी को चौंका दिया है। देवेश पिछले 5 साल से इस पर काम कर रहे हैं और अब उन्हें बड़ी सफलता मिल रही है। देश के साथ-साथ दुनिया में भी उनकी कंपनी द्वारा बनाए ड्रोन की अब मांग बढ़ती जा रही है।

देवेश ने साल 2017 में डेबेस्ट (Daybest) नाम से एक स्टार्टअप की शुरूआत की थी। उन्होंने 10 लाख से कंपनी की शुरूआत की। पिछले साल कंपनी ने 4 करोड़ का टर्नओवर किया। देवेश कहते हैं कि अभी कंपनी के पास 40 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट है।

नोएडा, बेंगलुरु, पटना, रायपुर में कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है। ड्रोन बनाने में लगने वालों सामानों में 70% आइटम्स स्वदेशी होते हैं, जबकि कुछ पार्ट इंपोर्ट किए जाते हैं। ड्रोन आइडिया को लेकर देवेश बताते हैं कि मैं ग्रामीण इलाके से आता हूं, जहां हर साल बाढ़ और दवाई न मिलने से लोगों की मौत हो जाती है। किसानों के पास फसल की सही जानकारी ना होने की वजह से सैकड़ों बीघे की खेती का बर्बाद हो जाना आम बात है। यही से हमने इसे लेकर कुछ करने का सोचा।

देवेश 2009 का एक वाकया बताते हैं। कहते हैं, उस वक्त मैं 11वीं क्लास में था। पटना जाते वक्त उनका एक्सीडेंट हो गया। कई घंटों के बाद मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया। देवेश को लगा कि यदि उनका भी कोई नाम होता तो उन्हें इतना इंतजार नहीं करना पड़ता।

देवेश कहते हैं कि बचपन से ही लगता था कि मैं कुछ नया करूंगा। 12वीं की पढ़ाई के बाद 2010 में देवेश दिल्ली आ गए। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी लिया लेकिन एक-दो महीने बाद ही कॉलेज छोड़ दिया।हालांकि देवेश ने कॉलेज छोड़ा, पढ़ाई नहीं। वे नई-नई किताबों और रिसर्च की स्टडी करने लगें। देवेश कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने डेटा साइंस पर कई संस्थानों के साथ जुड़कर काम किया। IIT कानपुर, IIT खड़गपुर के साथ मिलकर उन्होंने अपने स्टार्टअप पर वर्क किया।वह बताते हैं कि पिता BSNL में थे। उन्हें शुरू से पता था कि जैसे टेलीकॉम सेक्टर में क्रांति आई उसी तरह से नई इनोवेशन के जरिए टेक्नोलॉजी सेक्टर में क्रांति लाई जा सकती है। हर काम के लिए डेटा की जरूरत होती है। हमने बिहार सरकार के साथ मिलकर ड्रोन की मदद से सर्वेक्षण, फसल क्षति का आंकलन करने जैसे कामों को को भी कर रहे हैं।

देवेश कहते हैं कि कोरोना काल हमारे लिए टर्निंग पॉइंट रहा। नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्यों में ऐसे-ऐसे इलाके हैं जहां आसानी से कोविड वैक्सीन पहुंचाना चुनौतीपूर्ण था। ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के साथ मिलकर उन्होंने इन सुदूर इलाकों में वैक्सीन की खेप आसानी से पहुंचाई। जिसके बाद उनकी कंपनी की नई पहचान मिली।
नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्यों में ऐसे-ऐसे इलाके हैं जहां आसानी से कोविड वैक्सीन पहुंचाना चुनौतीपूर्ण था। उनके ड्रोन ने इसे सफल बनाया।

किसानों के लिए ‘ड्रोन’ संजीवनी

देवेश की कंपनी ऐसे ड्रोन का निर्माण कर रही है जो किसानों के सैकड़ों एकड़ की फसलों को कुछ घंटों में आसानी से स्प्रे करता है। वह कहते हैं कि किसानों को अपनी फसलों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करने में कई घंटे लग जाते हैं। इसे सूंघने से सेहत पर भी असर पड़ता है। अब तक देवेश द्वारा बनाए गए ड्रोन से 30 हजार एकड़ से अधिक की फसलों का छिड़काव किया जा चुका है।देवेश ने किसान स्टेशन भी बनाया है, जहां किसानों की फसलों का समाधान उनकी टीम द्वारा किया जाता है। देवेश कहते हैं कि ड्रोन की मदद से किसान घर बैठे भी फसल की मॉनिटरिंग कर सकते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत किसानों को फसलों को बर्बाद होने से पहले उसके मूल कारणों का पता लगाने और दवाओं का छिड़काव करने को लेकर होता है। देवेश के ड्रोन की मदद बिहार सरकार के अलावा हरियाणा सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार समेत कई राज्य सरकार कर रही हैं। अब हॉलैंड समेत यूरोप के कई देशों में भी इनके ड्रोन प्रोजेक्ट की डिमांड है।
देवेश कहते हैं कि ड्रोन में लगा एक खास सेंसर फसलों के बर्बाद होने से पहले ही बीमारियों की जानकारी दे देता है। सरकारी कृषि अधिकारी भी क्षति हुए फसलों का आसानी से आंकलन कर सकते हैं। फसलों के बर्बाद होने से पहले एडवाइजरी जारी कर सकते हैं।किसान खेत में लगे फसल को ड्रोन की मदद से ऑनलाइन मार्केटिंग कर सकते है। जो खरीदने वाले हैं वो इसे कही पर भी बैठकर देख सकते हैं। देवेश बताते हैं कि बदले टेक्नोलॉजी के साथ उनकी कंपनी ड्रोन में भी कई तरह के बदलाव ला रही है। फिलहाल एक ड्रोन उन्होंने तैयार किया है वह बाढ़ पीड़ितों तक आसानी से दवाई, खाद्य सामग्री ले जाने में सक्षम है।
देवेश कहते हैं कि यह 20 किलोग्राम तक के वजन को उठा कर 70 किलोमीटर तक का दूरी आसानी से तय कर सकती है। यह फ्यूल और बैटरी, दोनों से चलता है। बिहार में शराबबंदी लागू है। देवेश के ड्रोन का इस्तेमाल अब बिहार सरकार इसकी निगरानी करने के लिए कर रही है। वहीं, कृषि क्षेत्र में यह पहले से इस्तेमाल हो रहा है।

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