Monday, September 26, 2022

Kirori Singh Bainsla : कर्नल बैंसला को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ी भीड़, बड़े बेटे ने किया कर्नल का अंतिम संस्कार

एक अप्रैल (भाषा) गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के नेता रहे कर्नल (सेवानिवृत्त) किरोड़ी सिंह बैंसला का शुक्रवार को करौली जिले स्थित उनके पैतृक गांव मुंडिया में सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
84 वर्षीय बैंसला का बृहस्पतिवार को जयपुर में निधन हो गया था। उनके बड़े बेटे ने उन्हें मुखाग्नि दी। बृहस्पतिवार तड़के तबियत बिगड़ने पर बैंसला को जयपुर के एक निजी अस्पताल ले जाया गया था जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था।

इससे पूर्व बैंसला के पार्थिव शरीर को जयपुर स्थित उनके निवास स्थान से सेना के फूलों से सजे एक ट्रक में उनके पैतृक निवास करौली के मुंडिया गांव ले जाया गया। करीब 150 किलोमीटर की यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में उनके समर्थक अपने-अपने वाहनों से मुंडिया गांव पहुंचे। समर्थकों ने यात्रा के दौरान बैंसला ‘अमर रहे’ के नारे लगाये।

उनके पैतृक गांव मुंडिया में बैंसला के अंतिम संस्कार के दौरान महिलाओं, परिजनों समेत बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी।

करौली जिला कलेक्टर राजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि बैंसला के अंतिम संस्कार के दौरान पर्यटक मंत्री विश्वेन्द्र सिंह और उद्योग मंत्री शकुंतला रावत, विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता राजेन्द्र राठौड़, विधायक जोगेन्द्र अवाना, दिल्ली विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रामवीर सिंह विदूड़ी, भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत मौजूद थे।

करौली पुलिस अधीक्षक शेलेन्द्र सिंह ने बताया कि बैंसला के अंतिम संस्कार में उन्हें श्रृद्धांजलि देने के लिए करीब 35 से 40 हजार लोग मुंडिया गांव पहुंचे थे।

उल्लेखनीय है कि बैंसला राजस्थान में गुर्जर आरक्षण को लेकर चले आंदोलन के अगुवा व प्रमुख चेहरा रहे। साल 2007 व 2008 में चले इस आंदोलन में पुलिस गोलीबारी व अन्य हिंसक घटनाओं में 70 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस आंदोलन का असर भरतपुर, करौली, दौसा व सवाई माधोपुर जिलों में देखने को मिला था। बैंसला ने 2009 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव भी लड़े जिसमें उन्हें मामूली वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

बैंसला ने तीन दशक तक सेना में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध तथा 1965 व 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लिया था। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने गुर्जरों के लिए शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण का आंदोलन छेड़ा। गुर्जरों के लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने एक नई श्रेणी अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) सृजित करते हुए गुर्जर, रायका-रेबारी, गाडिया लुहार, बंजारा और गडरिया समाज के लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए पांच प्रतिशत का आरक्षण दिया।

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