Saturday, October 1, 2022

MCD Election 2022 : दिल्ली में केंद्र और केजरीवाल के बीच यह MCD चुनाव का नया पंगा क्या है?

नई दिल्‍ली: केंद्र और अरविंद केजरीवाल सरकार के बीच फिर टकराव की स्थिति बनी है। इस बार का मसला नगर निगम चुनाव को लेकर है। राज्‍य चुनाव आयोग (SEC) ने ऐन मौके पर चुनाव तारीखों का ऐलान टाल दिया। वजह दी कि केंद्र सरकार चाहती है कि दिल्‍ली के तीनों नगर निगमों का एकीकरण हो जाए। SEC के इस फैसले पर आम आदमी पार्टी आगबबूला है। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव आयोग के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर चुनाव टालने को कहना और आयोग का केंद्र के दबाव में आकर चुनाव टालना, दोनों ही जनतंत्र के लिए ठीक नहीं हैं। केंद्र की तरफ से मंत्री स्‍मृति इरानी सामने आईं। उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली सरकार ने निगमों को 13,000 करोड़ रुपये के फंड से वंचित रखा। जवाब में डेप्‍युटी सीएम मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस बुलाकर पलटवार किया। एमसीडी चुनाव 2022 को लेकर मची खींचतान की वजह क्‍या है और निगमों को तीन हिस्‍सों में बांटा क्‍यों गया था, समझ‍िए।

MCD को तीन टुकड़ों में क्‍यों बांटा गया?
साल 2012 में दिल्‍ली नगर निगम (MCD) को तीन हिस्‍सों में बांट दिया गया था। MCD दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नगर निकाय है। जनवरी 2012 में इसे दक्षिण दिल्‍ली नगर निगम (SDMC), उत्‍तर दिल्‍ली नगर निगम (NDMC) और पूर्वी दिल्‍ली नगर निगम (NDMC)। MCD के तहत 12 प्रशासनिक जोन थे जिनमें से SDMC को चार (सेंटर, साउथ, वेस्‍ट और नजफगढ़) मिले। NDMC के हिस्‍से रोहिणी, सिविल लाइंस, करोलबाग, सिटी सदर पहाड़गंज, केशवपुरम और नरेला आए। EDMC को शाहदरा नॉर्थ और शाहदरा साउथ दिया गया। MCD को तोड़ने की वजह बढ़ती आबादी और भौगोलिक इलाके को बताया गया था। अब तीनों निगम वित्‍तीय संकट से जूझ रहे हैं, वेतन देने में देरी हो रही है। इसके अलावा गंदगी से जुड़ी शिकायतों की भरमार है।

समस्‍या कब आई?
2011 से 2012 के बीच नए स्‍थानीय निकाय बनाने पर मंथन चला। उस वक्‍त दिल्‍ली में शीला दीक्षित की सरकार थी और केंद्र में भी कांग्रेस नीत यूपीए सत्‍ता में थी। MCD का बंटवारा दिसंबर 2011 में विधानसभा से पारित दिल्‍ली नगर निगम (संशोधन) अधिनियम के तहत किया गया। तीन भागों में बांटने के तीन-चार बाद परेशानियां शुरू हुईं। राजस्‍व का बंटवारा ठीक से नहीं होने की वजह से नॉर्थ और ईस्‍ट MCD वित्‍तीय संकट में फंस गए। पिछले छह सालों में इन दोनों निगमों में कई बार हड़ताल हुई। कोविड महामारी में SDMC की हालत भी खराब होती चली गई। वहां भी सैलरी में देरी हुई। पिछले दो साल में, नॉर्थ और ईस्‍ट MCD में सैलरी चार से छह महीने की देरी से जा रही है।

‘तीनों नगर निगमों के एक होने से बेहतर हो सकता है कामकाज’

दिक्‍कतें कहां हैं?
निगम अधिकारियों के अनुसार, बंटवारे के बाद ज्‍यादातर पॉश कॉलोनियां SDMC के दायरे में चली गईं। राजस्‍व का बंटवारा बराबर नहीं हुआ। यह भी दावा है कि ईस्‍ट MCD की करीब 87% आबादी बिना प्‍लानिंग वाले अवैघ एरियाज में रहती है जो उतना रेवेन्‍यू नहीं देती। दिल्‍ली के पांचों बड़े निगम अस्‍पताल नॉर्थ एमसीडी के दायरे में आते हैं और उनपर काफी खर्च होता है। जनवरी और फरवरी में जारी बजट बताते हैं कि बंटवारे के 10 साल बाद भी, EDMC अपने 60% राजस्‍व के लिए राज्‍य सरकार पर निर्भर है। नॉर्थ और ईस्‍ट MCD की ज्‍यादातर कमाई वेतन देने में ही चली जाती है।

MCDs पर बीजेपी का कब्‍जा है और दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी की सरकार। फंड के अलॉकेशन को लेकर दोनों दल आमने-सामने रहे हैं। मेयर्स ने कई बार दिल्‍ली सचिवालय के बाहर मार्च निकाले। सरकार का दावा है कि कोई फंड बाकी नहीं है और वित्‍तीय संकट के लिए भ्रष्‍टाचार और प्रशासनिक लापरवाही जिम्‍मेदार है।

केंद्र पर हमलावर हुए केजरीवाल
दिल्‍ली सीएम ने शुक्रवार को SEC और केंद्र को आड़े हाथों लिया। केजरीवाल ने कहा कि पिछले 75 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि केंद्र सरकार ने किसी राज्य के चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर चुनाव टालने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले 8 साल से केंद्र में बीजेपी की सरकार है और अगर केंद्र को तीनों एमसीडी को एक करना था तो अभी तक क्यों नहीं किया? चुनाव की तारीख घोषित करने से एक घंटे पहले अचानक याद आया कि अब तीनों एमसीडी को एक करना है, इसलिए चुनाव टाल दिए जाएं। लोग कह रहे हैं कि तीनों एमसीडी को एक करना तो एक बहाना है, असली मकसद तो चुनाव टालना है। आम आदमी पार्टी की जबरदस्त लहर को देखते हुए बीजेपी को अपनी हार का डर सता रहा था और इसके चलते चुनाव टाल दिए गए।

केजरीवाल बोले- मोदी जी यह देश के लिए ठीक नहीं है

सीएम केजरीवाल ने प्रधानमंत्री से हाथ जोड़कर अपील करते हुए कहा कि चुनाव रद्द न कराइए। अगर चुनाव रद्द होते हैं, तो यह जनतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि कल केजरीवाल भी नहीं रहेगा और मोदी जी भी नहीं रहेंगे, लेकिन यह देश रहेगा। इस देश को कमजोर नहीं करना है। स्टेट इलेक्शन कमिश्नर से भी कहना चाहूंगा कि अगर आप ऐसे चुनाव टाल देंगे तो जनतंत्र ही नहीं बचेगा।

लोग कह रहे हैं कि तीनों एमसीडी को एक करना तो एक बहाना है, असली मकसद तो चुनाव टालना है। आम आदमी पार्टी की जबरदस्त लहर को देखते हुए बीजेपी को अपनी हार का डर सता रहा था और इसके चलते चुनाव टाल दिए गए।

अरविंद केजरीवाल, सीएम एवं आप संयोजक

स्टेट इलेक्शन कमिश्नर से भी अपील
मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि स्टेट इलेक्शन कमिश्नर पर ऐसा क्या दबाव डाला गया, उनको क्या धमकी दी गई कि उन्होंने चुनाव टालने का फैसला किया। कमिश्नर अभी अप्रैल में रिटायर होने वाले हैं, तो उन्हें रिटायरमेंट के बाद का क्या कोई लालच दिया गया है? ऐसे कई सवाल लोग उठा रहे हैं? आखिर क्या कारण है कि एक घंटे के अंदर चुनाव टालने को तैयार हो गए है। उन्होंने स्टेट इलेक्शन कमिश्नर से भी अपील की कि अगर आप ऐसे चुनाव टाल देंगे, तो जनतंत्र ही नहीं बचेगा। अगर आप पर कोई भी दबाव है, धमकी दी जा रही है, लालच दिया जा रहा है तो आप देश की जनता को बताइए। पूरा देश आपका साथ देगा।

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BJP और AAP में तकरार
एमसीडी चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी की ओर से बीजेपी पर लगातार हमला बोला जा रहा है। शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने कहा कि दिल्ली सरकार की ओर एमसीडी को उसके हक का पैसा नहीं दिया जाता, जिसके बाद उपमुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी ने एमसीडी चुनाव टलवाने की साजिश रची है। अब बीजेपी की इस साजिश को छिपाने के लिए बीजेपी के बड़े नेता व केंद्रीय मंत्री बेतुके बयान दे रहे हैं। सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली सरकार ने समय-समय पर एमसीडी को उसका बजट दिया, लेकिन एमसीडी को बीजेपी ने अपने भ्रष्टाचार से खोखला बना दिया है। केंद्रीय मंत्री इरानी आकर देखें कि कैसे बीजेपी शासित एमसीडी ने दिल्ली को कूड़े का ढेर बना दिया है। बीजेपी के नेता देश के सामने आएं और बताएं कि चुनाव आयोग के अधिकारियों को एमसीडी चुनाव टालने के लिए सीबीआई, ईडी की धमकी दी या किसी पद का लालच दिया गया है।

होली से पहले हो सकता है फैसला
दिल्ली में एमसीडी चुनाव होंगे या नहीं, इस पर होली से पहले फैसला हो सकता है। राज्य चुनाव आयोग, केंद्र सरकार के लिखे पत्र के एक-एक पॉइंट पर कानूनी सलाह लेगा और चुनाव की किसी भी तरह गुंजाइश होने पर 20 अप्रैल तक इसकी घोषणा की जा सकती है। यह भी संभव है कि मामले को कोर्ट में भी चुनौती भी दिया जाए। राज्य चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार जिस दिन एमसीडी चुनावों की तारीख घोषित करनी थी, उसके ठीक आधे घंटे पहले केंद्र सरकार द्वारा लिखा पत्र एलजी की ओर से आया था। इसके पहले कभी किसी ने इस संबंध में कोई चर्चा नहीं की।

जैसे ही केंद्र का पत्र आयोग को मिला, उसी दिन एक कानूनी सलाह के लिए एक लीगल टीम बुलाई ली गई। आयोग के अफसरों का कहना है कि उसी दिन से पूरी टीम एक्ट की स्टडी कर रही है, ताकि केंद्र सरकार के लिखे पत्र के एक – एक बिंदुओं पर रिपोर्ट तैयार उपलब्ध कराया जा सके। सूत्रों का कहना है कि आयोग अभी भी चुनाव को लेकर सकारात्मक है और गुंजाइश हुई तो चुनाव की तारीख की घोषणा होली बाद की जा सकती है।

MCD चुनाव की तारीख टलने पर बीजेपी-AAP के बीच जुबानी जंग

नगर निगमों का एकीकरण करना उचित है? क्या इससे सभी समस्याएं हल हो जाएंगी? नगर निगमों का एकीकरण किया जाए या फिर तीन भागों में ही बंटी रहे, इस पर दिल्ली की तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों की राय:

गवर्नेंस की नाकामी से एकीकरण का बहाना : आप
आम आदमी पार्टी के एमसीडी प्रभारी दुर्गेश पाठक के मुताबिक, सवाल दिल्ली के तीनों नगर निगमों के एकीकरण का नहीं, बल्कि गवर्नेंस का है। बीते डेढ़ दशक में बीजेपी ने जिस तरह से नगर निगमों में शासन किया है, वही इनकी बदहाली की वजह है। ये समझना होगा कि नगर निगमों का सिर्फ एकीकरण करने से ही सब ठीक नहीं हो जाएगा। अगर सफाई व्यवस्था जर्जर है, करप्शन चरम पर है तो क्या सिर्फ निगमों का एकीकरण करने से ही सब दुरुस्त हो जाएगा ?

आम आदमी पार्टी नगर निगमों के एकीकरण के खिलाफ नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि अभी की निगमों की बदहाली सिर्फ इसलिए नहीं कि तीनों अलग-अलग निगम हैं। असली वजह गवर्नेंस है। इसी मामले में बीजेपी बुरी तरह से फ्लॉप हुई है। अब उसी नाकामी को छिपाने के लिए एकीकरण के नाम पर चुनाव टाल दिए गए। कायदे से प्रशासनिक सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि लोगों को अपने कार्य कराने के लिए दिक्कत न हो। करप्शन खत्म हो। निगम का बजट नहीं बढ़ रहा। जब दिल्ली में आप सरकार बनी थी तो दिल्ली का बजट 25 हजार करोड़ रुपये का था, जो अब 70 हजार करोड़ रुपये अधिक का हो गया है। ये गुड गवर्नेंस के कारण ही संभव हुआ है।

एकीकरण से सर्विस बेहतर करना मुश्किल: कांग्रेस
कांग्रेस के कम्युनिकेशन विभाग के चेयरमैन अनिल भारद्वाज के अनुसार, अगर सिर्फ वित्तीय दिक्कतों की वजह से दिल्ली के तीनों नगर निगमों का एकीकरण किया जा रहा है तो उससे बेहतर ये होता कि एकीकरण करने की बजाय तीनों निगमों की वित्तीय दिक्कतों को दूर किया जाता। सिर्फ वित्तीय दिक्कतों के नाम पर एकीकरण करने से सर्विस बेहतर नहीं किया जा सकता। इससे लोगों की दिक्कतें बढ़ेंगी। अभी हालत ये है कि दिल्ली में तीन नगर निगम हैं। तीन निगमायुक्त हैं और तीन मेयर। लेकिन अगर एक कमिश्नर और एक मेयर किया जाता है, तो क्या वे सालभर में सभी वॉर्डों का एक-एक बार भी दौरा कर पाएंगे?

जब दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में बांटा गया था, उस वक्त ऐसा नहीं कि आंख मूंदकर ये पैसला किया गया था। दरअसल, नगर निगम के गठन के बाद से दिल्ली की आबादी तेजी से बढ़ी थी और एक निगम के जरिए लोगों को अच्छी सर्विस उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बन गई थी। दिल्ली में बसे गांवों में भी कॉलोनियां बन चुकी थीं। वहां भी सभी सुविधाओं की जरूरत रहती है। दिल्ली में निगम के 272 वॉर्ड हैं, इतने तो साल में वर्किंग डे भी नहीं हैं। ऐसे में एक कमिश्नर व एक मेयर के लिए पूरी दिल्ली में काम करना मुश्किल हो गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सभी राजनीतिक दलों और एक्सपर्ट्स से राय ली थी। तब सुझाव आया था कि दिल्ली नगर निगम को पांच भागों में विभाजित किया जाए, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे तीन भागों में ही विभाजित करना उचित समझा। इसकी वजह ये थी कि लोगों को नगर निगम बेहतर सेवा दे सके। लेकिन डेढ़ दशक से बीजेपी इस मामले में नाकाम रही है।

व्यवस्थित होगा कामकाज, गैरजरूरी खर्चे बचेंगे : बीजेपी
बीजेपी के वरिष्ठ विधायक एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता का कहना है कि तीनों निगमों को विभाजित करने का फैसला राजनीति से प्रेरित था और बहुत जल्दबाजी में लिया गया था। इस फैसले ने निगमों की पूरी व्यवस्था को ही बदल डाला। दिल्ली अपने आप में एक शहर है और ऐसे में यहां एक ही नगर निगम होना चाहिए, ताकि उसके नियमों से लेकर फैसलों और कामों तक में एकरूपता रहे।

उनके मुताबिक, निगम के पास वित्तीय संसाधन पहले से ही सीमित थे। विभाजन ने निगमों के इस वित्तीय संकट को और बढ़ाने का काम किया। ऐसे में अपनी इनकम बढ़ाने के लिए निगमों ने अपनी जरूरत के अनुसार टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव करने से लेकर कई ऐसे नए नियम लागू कर दिए, जो दूसरे निगम में नहीं थे। ऐसे में एक ही शहर के अलग-अलग निगमों में अलग-अलग नियम कायदे बनने लगे और निगमों के कामकाज का पूरा ढांचा ही छिन्न-भिन्न हो गया। रही सही कसर आम आदमी पार्टी की सरकार ने निगमों के फंड रोक कर पूरी कर दी। इससे निगमों का वित्तीय संकट और गहरा गया।

गुप्ता के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि निगमों के एकीकरण की मांग आज ही की गई हो। यह बहुत पुरानी मांग है, लेकिन केजरीवाल सरकार के कार्यकाल में जो स्थितियां पैदा हुईं, उसे देखते हुए एकीकरण करना बेहद जरूरी हो गया है, अन्यथा दिल्ली का पूरा सिविक सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा। यही वजह है कि केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। निगमों के एक होने से व्यवस्थाओं में एकरूपता आएगी और निगमों का कामकाज बेहतर होगा।

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