Monday, September 26, 2022

क्या आपने कभी सोचा है कि एयरप्लेन कभी हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर से क्यों नहीं उड़ते? यहां जानें कारण

अगर आप नहीं जानते कि हवाई जहाज हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर से उड़ान भरने से क्यों बचते हैं और अन्य मार्गों का विकल्प चुनते हैं, तो चलिए इस लेख के जरिए हम आपको इसके पीछे का कारण बताते हैं। अक्सर यह देखा गया है कि हवाई जहाज हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर से नहीं उड़ते हैं और इसके बजाय उड़ान के लिए वैकल्पिक रास्तों का चयन करते हैं, भले ही उन्हें लंबी दूरी ही क्यों न तय करनी पड़े। आपने कभी सोचा है? चलिए हम आपको बताते हैं 

आपातकालीन लैंडिंग की गुंजाइश

हवाई जहाज प्रशांत महासागर के ऊपर से उड़ान भरने से बचते हैं और घुमावदार मार्गों का विकल्प चुनते हैं क्योंकि घुमावदार मार्ग सुरक्षित होते हैं। इसलिए वे समुद्र के ऊपर कम समय बिताते हैं, जिससे आपातकालीन लैंडिंग आसानी से की जा सके। एयरलाइंस हमेशा समतल जमीन पर इमरजेंसी लैंडिंग करते हैं। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्र भी आपातकालीन लैंडिंग के लिए सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि इस क्षेत्र में समतल सतह नहीं होती। इसके अतिरिक्त जोखिम कारक भी बढ़ जाता है क्योंकि हर जगह पहाड़ होते हैं।

बदलते मौसम का मिजाज

अधिकांश कमर्शियल एयरलाइनें हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ान भरने से बचती हैं क्योंकि मौसम संबंधी सभी घटनाएं क्षोभमंडल (Troposphere) में होती हैं और क्षोभमंडल की ऊंचाई स्थलमंडल (lithosphere) से बीस किलोमीटर तक होती है। क्षोभमंडल में मौसम हवाई जहाज के उड़ान भरने के लिए उपयुक्त नहीं होता है क्योंकि बदलते मौसम के पैटर्न का हवाई जहाज की उड़ान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के होने की संभावना होती है।

सैन्य अभियान

एक और कारण है कि कमर्शियल हवाई जहाज हिमालय के ऊपर से उड़ान नहीं भरते हैं, यही वजह है कि भारतीय वायु सेना और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी वायु सेना पहहले इस क्षेत्र में प्रशिक्षण सत्र आयोजित करती हैं। वे कमर्शियल एयरलाइनों को उनके ऊपर उड़ान भरने से रोकते हैं।

एयर टर्बुलेन्स

यदि कमर्शियल हवाई जहाज हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर से उड़ान भरते हैं तो उन्हें मौसम संबंधी समस्या से निकलना पड़ता है, जहां ऑक्सीजन की कमी भी होती है। इसके अलावा हिमालय की चोटियों पर, एयर टर्बुलेन्स भी असामान्य है जो हवाई जहाज की गति को प्रभावित करता है और यहां तक कि ऑक्सीजन की कमी के कारण यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

नेविगेशन रडार सेवा की कमी

हिमालयी क्षेत्र कम आबादी वाला होता है जिसके कारण नेविगेशन रडार सेवा मुश्किल से मिल पाती है और पायलटों को जमीन से संबंध स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और किसी भी आपात स्थिति में पायलट खराब नेविगेशन रडार सेवा के कारण कोई मदद नहीं ले पाता। इसलिए पायलटों को हिमालय और प्रशांत महासागर के ऊपर से उड़ान भरने के बजाय विकल्प चुनना बेहतर लगता है।

आपातकालीन ऑक्सीजन खत्म होने का खतरा

इन क्षेत्रों में ऑक्सीजन खत्म होने का भी खतरा है क्योंकि एयरलाइंस के पास आमतौर पर केवल बीस मिनट की आपातकालीन ऑक्सीजन होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में जहां आपूर्ति समाप्त हो जाती है, ऑक्सीजन को फिर से भरने के लिए उड़ान को कम से कम 10,000 फीट नीचे उतरना पड़ता है, जिसे ड्रिफ्ट डाउन प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है। लेकिन हिमालय में 10,000 फीट तक उतरना आत्महत्या है।

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